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शून्य हूँ मैं
शून्य हूँ मैं, न कोई आकार,
दिखने में तो बस हूँ बेकार।
साथ किसी के पीछे खड़ा,
बना दूँ दस, सौ, हजार।।
रहकर साथ यूँ लगे लगाऊँ,
गिरते को भी ऊँचाइयाँ दिलाऊँ।
पर गलती से यदि टकराये,
मूल्य सभी का मिटा ही जाऊँ।।
सिखा रहा जग को यह पाठ,
सही जगह रहो तो बढ़ेगा साथ।
मैं शून्य हूँ, पर अर्थ महान,
मैं साथ खड़ा तो दूँ सम्मान।।
सौरभ संदेश मेरा ये मानो,
सही स्थान पर रह पहचानो।
योग्यता, अनुशासन, साथ सही,
तभी बढ़ेगी शक्ति अनंत कहीं।।
डॉ. सत्यवान सौरभ